अंतर आस्था से अंतर यात्रा : इस खोज में जीवंत , द्वारा रवि रविंद्र
मैं उस वार्तालाप में शामिल होना चाहता हूँ जिसे अन्तर यात्रा वाला संवाद कहा जा सकता है। मेरे मत में, अंतर-आस्था वालों के संवाद में कुछ कमी है। जब पूर्व-पश्चिम के संवाद या अंतर- आस्था वाले संवाद , अतीत से अत्यधिक बंधे होते हैं, तो संस्कृतियों और धर्मों की गतिशील प्रकृति, और उससे भी ज्यादा , मनुष्यों की गतिशीलता, की सराहना नहीं की जा सकती। यदि किसी ने कभी किसी अन्य संस्कृति या धर्म के व्यक्ति से मुलाकात नहीं की है, तो अंतर -आस्था वाला या अंतर-सांस्कृतिक संवाद निश्चित रूप से एक अच्छा विचार है। लेकिन मैं यह जितना संभव हो उतना जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अंतर-आस्था संवाद मानव-से-मानव संवाद का मात्र प्रारंभिक चरण है और यह गहरी समझ में बाधा भी बन सकता है।
संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच होने वाला संवाद, जिसमे लोग किसी खास आस्था या संस्कृति से अपनी निष्ठा जोड़ते हैं, वह उन धर्मों और संस्कृतियों को उनके ही अपने पुराने व्यक्तित्व में जोड़ सकता है । लेकिन वास्तव में, ये सभी जीवंत और परिवर्तनशील हैं ,और इस समय बड़े बदलावों से गुजर रहे हैं। एक अंतर-यात्रा वाला संवाद, जो स्वाभाविक रूप से अंतर-सांस्कृतिक, अंतर-धार्मिक और बहु-विषयक होता है, गहरी समझ और भविष्य के विकास के लिए जरूरी है। हमें इस विकास को रोकना नहीं चाहिए , और ना हीं पारंपरिक मान्यताओं को नया रूप देने के प्रयास को रोकना चाहिए , इस बात पर जोर दे कर कि हर कोई अपने अतीत के , किसी न किसी रूप से, अपने जुड़ाव को घोषित करे|
हर महान आध्यात्मिक गुरु, खासकर जो वास्तव में क्रांतिकारी थे, जैसे बुद्ध, कृष्ण और मसीह, परंपराओं के गहरे संदेश की ओर संकेत करते हैं जो इन परमपराओं में सूक्ष्म मूल तत्त्व से शामिल है | साथ ही वह विश्वासघात (ध्यान दें कि विश्वासघात शब्द "परंपरा" वाले सशब्द से मूल रूप से जुड़ा है ) जो उनके द्वारा एक दैविक शक्ति के वास्तविक जीवंत ह्रदय से , उनके द्वरा किया गया है | दुसरे को , या अपने आप को, किसी पुराने ढांचे में डाल कर सही करने की प्रक्रिया , और उसके नतीजन एक अनापेक्षित असीम बदलाव की संभावना से इनकार करना, पवित्रता के विरुद्ध एक पाप है। किसी को एक जीवंत व्यक्ति के बजाय सिर्फ एक वस्तु के रूप में देखना, 'तुम' के बजाय 'यह' के रूप में देखना भी उसी पाप में शामिल है |
प्रेम की खोज सिर्फ एक व्यक्तिगत इच्छा बन सकती अपनी सुविधा एवं सुरक्षा के लिए, ठीक उसी तरह जैसे सत्य की खोज , मोटे तौर पर, एक तकनिकी तिकड़म बन सकती है , जिसमे प्रकृति का इस्तेमाल युद्ध एवं औद्योगिक सेवा में लिया जाता है , अपने भय एवं लालच की पूर्ती के लिए| जब भी सत्य और प्रेम को एक दुसरे से अलग कर दिया जाता है , तो उसका नतीजा होता है भावुकता अथवा नीरस बौद्धिकता ,जहाँ पर ज्ञान करुणा से अलग एवं जुदा होता है | भेदभाव हरदम भय एवं हिंसा के बीज लिए होता है| इस तरह “ हमारे प्रिय भगवान् “ के नाम पर कई लोगों की जान ली गयी है और कई तरह के आघात करने वाले शस्त्र तैयार किये गए हैं , एक “ शुद्ध ज्ञान “ की प्रतिबद्धता का सहारा ले कर| पर ये बात मानवता का उत्तम रूप नहीं है , विज्ञानं में और ना हीं धर्मं में| एकीकृत अथवा संपूर्ण इंसान ने , हर इक संस्कृति एवं हर इक युग में, सत्य , प्रेम , अंतर्दृष्टि एवं जिम्मेवारी की खोज की है| मन - बुद्धि से ऊपर , हमारी आत्मा खोजती है पूर्णता को , और उसी के द्वारा वो संपर्क कर पाती है प्रज्ञा एवं करुणा से |
हम इसे यहाँ ख़त्म न मान लें, क्योंकि सत्य विशालता में है , सभी सुत्रिकरणों एवं प्रारूपों से परे| इस खोज में जीवंत बने रह कर ही हम जीवित रह सकते हैं| दैविक शक्ति के प्रति खुलापन मांगती है, त्याग , मुख्यतः अपने छोटेपन के अहसास का , जो की आश्रित है एक धर्म, एक देश अथवा एक संप्रदाय से एक हमारी एकलौती पहचान पर | एक व्यक्ति जो न इस जगह का है न उस जगह का है – शारीरिक अथवा मानसिक रूप से – हो सकता है असहज महसूस करे , पर यह ही उसकी स्वतंत्रता की कीमत है एवं इसके चालित रहने की कीमत है| एक ही आभास, जिसकी आवश्यकता है , वह यह है कि यहाँ पर एक सूक्ष्म दुनिया है , और मुझे उसके द्वारा भी देखा जा रहा है | मेरा अस्तित्व अभी, यहाँ पर, उस सूक्ष्म दुनिया के प्रकाश में है| उस सूक्ष्म दुनिया की उपस्थिति का एहसास करना और उस दृष्टि की रौशनी में जीवित रहना , मांगती है , एक निरंतर , भेदभाव रहित, अपने , अस्तित्व का निरिक्षण , और वह बदले में मांगता है हमारे अपने स्वार्थ से जुड़े रहने के त्याग को| यहाँ आवश्यकता है हमारी धार्मिक मन , (जो की शांत , करुणामयी ,विस्तृत एवं मासूम है), को सभी प्रकार के प्रकरणों में इस्तेमाल करने की | ना सिर्फ विज्ञान में, बल्कि तकनीकी ज्ञान में भी, कलाएं,गवर्नमेंट,शिक्षा एवं अन्य प्रसंगों में भी |
और धार्मिक मन - जो पवित्रता की भावना से भरा हुआ मन है - एक व्यक्तिगत आत्मा में विकसित होता है। यह ज्ञान प्रणालियों या कल्पनाओं जैसे कि विज्ञान और धर्म या धर्मशास्त्र को एक साथ लाने का मामला नहीं है। जो आवश्यक है वह है धार्मिक मन का विकास। नया प्रकार (मॉडल) हमेशा चिरस्थायी होता है। चेतना-विवेक का एक ऐसा स्तर प्राप्त करना संभव है जो प्रत्येक प्राणी की विशिष्टता के साथ-साथ सभी के साथ उनकी एकता को भी देखता है। यह काफी हद तक अभौतिक और आध्यात्मिक परिवर्तन का मामला है जिसके लिए व्यक्ति को अपनी लघुता का निरंतर त्याग करना आवश्यक है - दिमाग़ से, हृदय से तो और भी अधिक। नए रूप स्वाभाविक रूप से अलग होंगे। सत्य का कोई इतिहास नहीं होता; सत्य की अभिव्यक्तियाँ होती हैं। नई सुबह, जब हम इसे सामान्य आँखों से देखने के लिए नहीं होंगे, एक नया गीत और एक नया शब्द लेकर आएगी। लेकिन मूल शब्द बना रहेगा, जिसे अक्सर शब्दों के बीच की खामोशी में सुना जाता है।
मनन के लिए मूल प्रश्न : आप इस धारणा से कैसे संबंधित हैं कि सत्य सभी प्रारूपों और सुत्रिकरणों से परे विशालता में है? क्या आप उस समय की कोई व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं जब आपने इस विशालता को महसूस किया हो? विशालता की खोज में जीवंत बने रहने में आपको क्या मदद करता है?