पूछें कि आपका मन मुक्त क्यों नहीं है
⁃ जे कृष्णमूर्ति के द्वारा
'स्वतंत्रता' शब्द का तानाशाही और लोकतांत्रिक सरकारों, और यहाँ तक कि धर्मों द्वारा भी पूरी दुनिया में बहुत दुरुपयोग किया गया है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वाधीनता का अस्तित्व कहीं नहीं है, शायद वैज्ञानिक जगत को छोड़कर। यह व्यापार की दुनिया में या उन धार्मिक ढाँचों में मौजूद नहीं है जिन्हें मनुष्य ने डर और विश्वास के आधार पर बनाया है; यह सरकारों में या मानवीय गतिविधि के किसी भी क्षेत्र में नहीं है। लेकिन मनुष्य लगातार यह दावा करता रहा है कि वह स्वतंत्र है और शिकायत करता है कि यह वातावरण है जो उसे गुलाम बनाता है।
स्वतंत्रता, स्पष्ट रूप से अपने लिए सोचने की स्वाधीनता है, न कि समाज के आदेशों या अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के अनुसार कार्य करना... स्वतंत्रता केवल किसी चीज़ 'से' मुक्ति नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक स्वतंत्र अवस्था है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो मन में आए वही किया जाए, इसलिए व्यक्ति को केवल शब्दों से नहीं बल्कि वास्तव में समझना होगा कि इस शब्द का अर्थ क्या है। हम स्वतंत्रता को परिभाषित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं; हर कोई अपनी पसंद या परवरिश के अनुसार इसकी व्याख्या करेगा, और कुछ तो यह भी कहेंगे कि ऐसी किसी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है।
स्वतंत्रता उसे खोजने से नहीं मिलती, बल्कि यह समझने से मिलती है कि वह क्या है जो मन को कैद करता है। जब इन जेल की दीवारों को तोड़ दिया जाता है, तो स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से आ जाती है, और इसे खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि स्वतंत्रता कैसे प्राप्त की जाए या यह पूछा जाए कि स्वतंत्रता क्या है, बल्कि यह पूछना महत्वपूर्ण है कि यह मन, जो समय और वातावरण की उपज है और जिसने दुख और संघर्ष के इतने अनुभव झेले हैं, स्वतंत्र क्यों नहीं है।
यह पता लगाएँ कि लाखों वर्षों के बाद भी मन इतना अधिक अनुकूलित (conditioned) क्यों है। मन समाज, उसकी संस्कृतियों, कानूनों, धार्मिक प्रतिबंधों, आर्थिक दबावों आदि द्वारा बंधा हुआ है। मन, आखिरकार, अतीत का परिणाम है, और यह अतीत ही परंपरा है। यह इसी परंपरा में अपने तमाम संघर्षों, युद्धों और पीड़ाओं के साथ जीता है। व्यक्ति को यह पूछना चाहिए कि क्या वह अपने स्वयं के इस अनुकूलन (कंडीशनिंग) से मुक्त हो सकता है। अनुकूलन से मुक्ति के बिना, मानवता हमेशा एक कैदी बनी रहेगी और जीवन एक युद्ध का मैदान बना रहेगा।
इस जांच में समझने वाली पहली बात 'सत्ता' या 'अधिकार' (authority) का स्वरूप है। किसी भी समुदाय में कानून और पुलिसकर्मी आवश्यक हैं, लेकिन हमने विचार और भावना की आंतरिक दुनिया में भी एक पुलिसकर्मी बिठा दिया है। इस दुनिया में परंपरा, अनुभव और आदत के माध्यम से आज्ञाकारिता बिठाई गई है—माता-पिता, समाज और पुजारी की आज्ञा मानना। लेकिन आज्ञाकारिता डर से पैदा होती है—गलत होने का डर, स्वतंत्र रूप से कार्य करने का डर, सुरक्षित न होने का डर, समुदाय का हिस्सा न होने का डर, अकेले खड़े होने का डर, या गलती करने का डर।
एक ऐसा अनुशासन जो बिना किसी दबाव के स्वाभाविक रूप से आता है, वह है इन सभी डरों, चिंताओं और ईर्ष्याओं का सरल अवलोकन करना; अपने स्वयं के डर और अपनी महत्वाकांक्षाओं को वैसे ही देखना जैसे आप एक पेड़ को देखते हैं। यह 'देखना' ही वह अनुशासन है। अनुशासन शब्द का अर्थ 'सीखना' है, न कि अंधानुकरण , दमन या आज्ञाकारिता। अनुकूलन (कंडीशनिंग) की प्रकृति और उसकी संरचना को सीखने से व्यवस्था (order) आती है; वह समाज वाली व्यवस्था नहीं जो वास्तव में अव्यवस्था है।
चिंतन के लिए प्रश्न-
आप इस विचार से कैसे जुड़ते हैं कि सच्ची स्वतंत्रता उसे खोजने से नहीं, बल्कि यह गहराई से समझने से मिलती है कि वह क्या है जो मन को कैद करता है?
क्या आप कोई ऐसी कहानी साझा कर सकते हैं जिसने आपको अपने स्वयं के अनुकूलन/कंडीशनिंग को समझने और उससे मुक्त होने के अर्थ को समझने में मदद की हो?
वह क्या चीज़ है जो आपको अपने डर, चिंताओं और ईर्ष्या को एक पेड़ को देखने जैसी सरल स्पष्टता के साथ देखने में मदद करती है, जिससे एक ऐसा अनुशासन विकसित होता है जो अंधानुकरण (conformity) के बजाय सीखने पर आधारित हो?
J. Krishnamuti was a great Indian philosopher of the 20th century.
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion that true freedom is to be found not by seeking it but rather through a deeper understanding of what it is that imprisons the mind? Can you share a personal story that has helped you understand the depth of your own conditioning and what it means to break free from it? What helps you observe your fears, anxieties, and envies with the simple clarity of seeing a tree, thereby fostering a discipline that is rooted in learning rather than conformity?