Reader comment on Thich Nhat Hanh's passage ...

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    On Feb 12, 2013 Rekha wrote:

     Fearlessness
    --by Thich Nhat Hanh (Feb 11, 2013)

    Most of us experience a life full of wonderful moments and difficult moments. But for many of us, even when we are most joyful, there is fear behind our joy. We fear that this moment will end, that we won’t get what we need, that we will lose what we love, or that we will not be safe. Often, our biggest fear is the knowledge that one day our bodies will cease functioning. So even when we are surrounded by all the conditions for happiness, our joy is not complete.
     
    We may think that if we ignore our fears, they’ll go away. But if we bury worries and anxieties in our consciousness, they continue to affect us and bring us more sorrow. We are very afraid of being powerless. But we have the power to look deeply at our fears, and then fear cannot control us. We can transform our fear. Fear keeps us focused on the past or worried about the future. If we can acknowledge our fear, we can realize that right now we are okay. Right now, today, we are still alive, and our bodies are working marvelously. Our eyes can still see the beautiful sky. Our ears can still hear the voices of our loved ones.
     
    The first part of looking at our fear is just inviting it into our awareness without judgment. We just acknowledge gently that it is there. This brings a lot of relief already. Then, once our fear has calmed down, we can embrace it tenderly and look deeply into its roots, its sources. Understanding the origins of our anxieties and fears will help us let go of them. Is our fear coming from something that is happening right now or is it an old fear, a fear from when we were small that we’ve kept inside? When we practice inviting all our fears up, we become aware that we are still alive, that we still have many things to treasure and enjoy. If we are not pushing down and managing our fear, we can enjoy the sunshine, the fog, the air, and the water. If you can look deep into your fear and have a clear vision of it, then you really can live a life that is worthwhile. 
     
    The Buddha was a human being, and he also knew fear. But because he spent each day practicing mindfulness and looking closely at his fear, when confronted with the unknown, he was able to face it calmly and peacefully. There is a story about a time the Buddha was out walking and Angulimala, a notorious serial killer, came upon him. Angulimala shouted for the Buddha to stop, but the Buddha kept walking slowly and calmly. Angulimala caught up with him and demanded to know why he hadn’t stopped. The Buddha replied, “Angulimala, I stopped a long time ago. It is you who have not stopped.” He went on to explain, “I stopped committing acts that cause suffering to other living beings. All living beings want to live. All fear death. We must nurture a heart of compassion and protect the lives of all beings.” Startled, Angulimala asked to know more. By the end of the conversation, Angulimala vowed never again to commit violent acts and decided to become a monk.
     
    How could the Buddha remain so calm and relaxed when faced with a murderer? This is an extreme example, but each of us faces our fears in one way or another every day. A daily practice of mindfulness can be of enormous help. Beginning with our breath, beginning with awareness, we are able to meet whatever comes our way.
     
    Fearlessness is not only possible, it is the ultimate joy. When you touch nonfear, you are free. If I am ever in an airplane and the pilot announces that the plane is about to crash, I will practice mindful breathing. If you receive bad news, I hope you will do the same. But don’t wait for the critical moment to arrive before you start practicing to transform your fear and live mindfully. Nobody can give you fearlessness. Even if the Buddha were sitting right here next to you, he couldn’t give it to you. You have to practice it and realize it yourself. If you make a habit of mindfulness practice, when difficulties arise, you will already know what to do.
     
    --Thich Nhat Hanh
     
     
     
    निर्भयता
    - टिक नैट हान (13 फरवरी, 2013)
     
    हम में से अधिकतर लोग जीवन में अद्भुत और मुश्किल क्षणों का अनुभव करते हैं। लेकिन हममें से बहुत से लोग जब काफी खुश भी होते हैं तब भी उस ख़ुशी के पीछे एक डर छिपा रहता है। हम डरते हैं कि यह क्षण खत्म हो जाएगा, या हमें वो नहीं मिलेगा जिसकी हमें ज़रुरत है, या हम जिसे प्यार करते हैं, उसे खो देंगे, या हम सुरक्षित नहीं रह पाएँगे। प्रायः हमारे मन में सबसे बड़ा डर यह होता है कि एक दिन हमारा शरीर काम करना बंद कर देगा। तो हमारे चारों तरफ आनन्द का वातावरण फैला होते हुए भी हमारा मन पूरी तरह खुश नहीं होता। 
     
    हम शायद यह सोचते हैं कि अगर हम अपने डर को अनदेखा कर दें, तो वो अपने आप मिट जाएगा। लेकिन अगर हम चिंताओं और आशंकाओं को अपने अंतःकरण में दबा देते हैं, तो भी वो हमें प्रभावित करती रहती हैं और हमें और दुःख देती हैं। हम शक्तिहीन होने से बहुत डरते हैं। लेकिन हमारे पास इन आशंकाओं के भीतर झाँकने की शक्ति है, और तब भय हमें नियंत्रित नहीं कर पाएगा। हम अपनी आशंकाओं का रूप बदल सकते हैं। भय हमें अपने अतीत पर या भविष्य की चिंताओं पर केन्द्रित रखता है। अगर हम इस डर को स्वीकार कर लें तो हम जान लेंगे कि इस पल में सब कुछ ठीक है। अभी, आज, हम जिंदा हैं, और हमारे शरीर आश्चर्यजनक रूप से काम कर रहे हैं। हमारी आँखें इस खूबसूरत आकाश को देख सकती हैं। हमारे कान अब भी प्रियजनों की आवाज़ सुन सकते हैं। 
    अपने डर की तरफ ध्यान देने के लिए सबसे पहले हमें उसे बिना किसी धारणा के अपनी जागरूकता में लाना होगा। हम सिर्फ हौले से उसके होने को स्वीकार करते लेते हैं। केवल यह भाव ही मन को बहुत राहत दिलाता है। फिर जब हमारा डर कुछ शांत हो जाता है, तब हम उसे प्यार से गले लगा सकते हैं और उसकी जड़, उसके स्रोत को ध्यान से देख सकते हैं। अपनी चिंताओं और डर के मूल कारण को समझ लेने से हमें उनसे मुक्त होने में मदद मिलेगी। क्या हमारा डर किसी ऐसी बात से आ रहा है जो इस वक्त हो रही है या यह कोई पुराना डर है, कोई ऐसा डर जो हमने बचपन से अपने मन में रखा हुआ है? जब हम अपने डर को बाहर निकाल पाने का अभ्यास करते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि हम अब भी जिंदा हैं, और हमारे पास ऐसी बहुत सी बहुमूल्य चीज़ें हैं जिनका हम आनंद ले सकते हैं। अगर हम अपने डर को सिर्फ दबा या उसका कोई उपाय करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, तो हम इस धूप, कोहरे, हवा और पानी का आनंद ले सकते हैं। अगर आप अपने डर की गहराई में झाँक पाएं और उसे स्पष्ट तरीके से देख सकें तो आप एक सार्थक जीवन जी सकते हैं।  
     
    बुद्ध एक इंसान थे, और उन्हें भी डर का ज्ञान था। लेकिन क्योंकि उन्होंने हर दिन सचेत साधना और अपने डर को ध्यान से देखने में निकाला, जब उन्हें अज्ञात चीज़ों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने यह बहुत धैर्य और शांति से किया। उनके बारे में एक कहानी है कि वे एक बार कहीं चले जा रहे थे और अंगुलीमाल नामक एक बहुत कुख्यात हत्यारा उनके सामने आ गया। अंगुलीमाल ने चिल्लाकर बुद्ध को रुकने के लिए कहा, लेकिन बुद्ध् शान्ति से हौले-हौले चलते रहे। अंगुलीमाल फिर उनके पास पहुंचा और उसने बुद्ध से पूछा कि वे उसके कहने पर रुके क्यों नहीं। बुद्ध ने जवाब दिया, "अंगुलीमाल, मैं बहुत पहले ही रुक चूका था, वो तो तुम हो जो अब तक नहीं रुके।" उन्होंने उसे समझाया, "मैंने ऐसे सब कर्म करने बंद कर दिए जो दूसरों को तकलीफ पहुंचाएं। हर प्राणी जीना चाहता है। हर प्राणी मरने से डरता है। हमें अपने मन में दूसरों के लिए दया जगानी चाहिए और हर प्राणी की जान की सुरक्षा करनी चाहिए।" हैरान होकर अंगुलीमाल ने उन्हें और बताने के लिए कहा। उस बातचीत के अंत तक अंगुलीमाल ने कसम खा ली कि वह कोई हिंसक काम नहीं करेगा और उसने साधू बन जाने की ठान ली। 
     
    एक हत्यारे के सामने बुद्ध इतने शांत और निश्चिन्त कैसे रह पाए? यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन हममें से हर एक इन्सान हर दिन किसी न किसी तौर से अपने डर का सामना करता है। प्रतिदिन सचेत साधना हमें इस काम में बहुत मदद करेगी। अपनी श्वास पर ध्यान देने से शुरू करके, अपनी जागरूकता से शुरू करके, जो भी हमारे रास्ते में आता है, हम उसका सामना कर सकते हैं। 
     
    निर्भयता सिर्फ सम्भव ही नहीं बल्कि वह एक परम आनंद है। जब हम अभय को छू लेते हैं, तो हम आज़ाद हो जाते हैं। अगर मैं कभी हवाई जहाज़ में सफर कर रहा हूँ, और पायलट यह घोषणा कर दे कि जहाज़ गिरने वाला है, तो मैं सचेंत प्राणायाम पर ध्यान दूंगा। अगर आप को कोई बुरी खबर मिले, तो मेरी आशा है आप भी ऐसा ही करेंगे। पर अपने डर को परिवर्तित करने और सचेत अवस्था में जीने की साधना को शुरू करने से पहले ऐसे नाज़ुक क्षणों के आने का इंतज़ार मत करो। हमें कोई निर्भयता दे नहीं सकता। अगर बुद्ध भी यहाँ ठीक आपके पास बैठे होते, तो वो भी नहीं दे सकते थे। इसका अभ्यास आपको खुद करना होगा और खुद ही इसका अहसास करना होगा। अगर आप सचेत साधना को अपनी आदत बना लें, तो जब परेशानियां आएंगी, तो आपको पहले से ही पता होगा कि उनका सामना कैसे करना है। 


     --टिक नैट हान


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