Reader comment on Rebecca Solnit's passage ...

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    On Apr 30, 2013 Rekha wrote:

     à¤ªà¥ˆà¤¦à¤² चलने के अनंत फायदे 
    - रेबेका सोनित (१जून, २०१३)
    देखा जाए तो पैदल चलना  à¤•à¥à¤› ऐसी à¤…वस्था है जिसमें हमारा मन, शरीर और संसार जैसे एक सीध à¤®à¥‡à¤‚ खड़े हों, à¤œà¥ˆà¤¸à¥‡ कि तीन पात्र à¤†à¥™à¤¿à¤°à¤•à¤¾à¤° एक दूसरे से बातचीत कर पा रहे हों, जैसे à¤¤à¥€à¤¨ स्वर अचानक मिलकर एक सरगम बना रहे हों। पैदल चलना हमें अपने शरीर और दुनिया द्वारा व्यस्त हुए बिना हमें अपने शरीर और दुनिया के साथ चलने में मदद करता है। यह  à¤¹à¤®à¥‡à¤‚ अपने विचारों में खो जाने कि बजाए हमें सोचने की à¤†à¤œà¤¼à¤¾à¤¦à¥€ à¤¦à¥‡à¤¤à¤¾ है। 
    मुझे à¤ à¥€à¤• से पता नहीं था कि मैं उस चट्टान के सिरे पर कुछ जल्दी पहुँच गया था या की कुछ देर से, जहाँ जमुनी रंग के à¤²à¥‚पिन के सुंदर फूल खिलते हैं, लेकिन मिल्कमेड के à¤«à¥‚ल सडक के किनारे छाया में, à¤ªà¤—डंडी के रास्ते पर खिले हुए थे, और उन्होंने à¤®à¥à¤à¥‡ अपने बचपन के उन पहाड़ों की याद् दिला दी,जहाँ सबसे पहले ये सफ़ेद फूल खिलते थे। काले रंग की तितलियाँ मेरे चारों ओर मंडरा रहीं थीं, हवा के झोंकों और पंखों की फड़फड़ाहट से इधर उधर उड़तीं, और उन्होंने मुझे अपने उस गुज़रे ज़माने की à¤¯à¤¾à¤¦ दिला दी। पैदल चलने से समय के साथ-साथ चलना à¤•à¥à¤› आसान à¤¹à¥‹ जाता है; हमारा मन पल में à¤¯à¥‹à¤œà¤¨à¤¾à¤“ं से यादों, और यादों से प्रत्यक्ष में भटक à¤²à¥‡à¤¤à¤¾ है। 
    पैदल चलने की लय से मन की सोच में भी एक  à¤²à¤¯ à¤ªà¥ˆà¤¦à¤¾ होती है, और किसी प्राकृतिक रास्ते से गुजरने से मन में बहुत से à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤° भी उत्पन्न होते हैं, या गूँज उठते हैं। इससे हमारे आंतरिक à¤”र बाहरी à¤°à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥‹à¤‚ में एक अजीब-सा तालमेल हो जाता है, जिससे à¤¹à¤®à¥‡à¤‚ लगता à¤¹à¥ˆ कि à¤®à¤¨ भी एक तरह का दृष्य है और पैदल चलना à¤‰à¤¸à¥‡ पार करने का एक तरीका है। हर नया विचार उस दृश्य का हिस्सा ही à¤²à¤—ता है जो हमेशा से वहीं था, मानो यह सोच एक à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ ही है , उस विचार की शुरुआत नहीं। इसलिए पदयात्रा के इतिहास का एक पहलू है विचारों के इतिहास को ठोस बनाना - क्योंकि मन की चाल की à¤–ोज कर पाना à¤®à¥à¤¶à¥à¤•à¤¿à¤² है, पर पैरों की चाल की खोज कर पाना आसान है।   
    पैदल चलने को एक देखने लायक गतिविधि भी माना जा सकता है, हर पदयात्रा à¤‡à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤¨à¤¾à¤¨ से उन à¤¦à¥ƒà¤¶à¥à¤¯à¥‹à¤‚ को देखने और उन पर विचार करने à¤•à¥‡ लिए है, अज्ञात चीज़ों को ज्ञात चीज़ों से जोड़ने के लिए। शायद à¤ªà¥ˆà¤¦à¤² à¤šà¤²à¤¨à¥‡ की यही à¤…जीब उपयोगिता à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤°à¤•à¥‹à¤‚ के बहुत à¤•à¤¾à¤® आती है। इस यात्रा से पैदा होने वाले à¤†à¤¶à¥à¤šà¤°à¥à¤¯, मुक्ति, à¤”र चीज़ों का साफ-साफ दिखाई पड़ना, इन सबको पाने à¤•à¥‡ लिए हम अपने आस-पड़ोस का à¤šà¤•à¥à¤•à¤° लगा सकते हैं, और या फिर à¤¦à¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का, à¤”र पास और दूर की जगहों की à¤¸à¥ˆà¤° कर सकते हैं।  
    या शायद à¤šà¤²à¤¨à¥‡ को गतिविधि ही à¤•à¤¹à¤¨à¤¾ चाहिए, यात्रा नहीं, क्योंकि इंसान एक दायरे में चल सकता है या एक कुर्सी पर बंधे पूरे विश्व का चक्कर लगा सकता है, और यात्रा का मज़ा तो सिर्फ चलते à¤¶à¤°à¥€à¤° की गतिविधियों से ही आता है, न कि कार, नाव या हवाई-जहाज़ के चलने से। वो तो शारीरिक à¤—तिविधि और à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ सामने निकलते दृश्य मिलकर हमारे मन में कोई à¤—तिविधि पैदा करते हैं, यही हमारी यात्रा को अस्पष्ट और बेअंत फायदेमंद बनाता है; यह अपने आप में एक रास्ता भी है और एक अंत भी, यात्रा भी और उद्देश्य भी।  
    - रेबेका सोनित
      
    Seed questions might be: "How do you relate to the notion of treating thoughts as a landscape that has been there all along? What is the connection between walking and thinking for you? Can you share a personal experience that brings out the connection between walking and thinking? "
    कुछ मूल à¤¬à¥€à¤œ सवाल: "आप अपने उन à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के बारे में क्या सोचते हैं जिन्हें एक ऐसे à¤¦à¥ƒà¤¶à¥à¤¯ की तरह माना जाए à¤œà¥‹ हमेशा से यहीं था? à¤†à¤ªà¤•à¥‡ लिए पैदल चलने और सोच-विचार करने का आपस में क्या सम्बन्ध à¤¹à¥ˆ? क्या आप अपना कोई  à¤…नुभव सबके सामने रखना चाहेंगे जहाँ पैदल चलने à¤”र सोचने में कोई सम्बब्ध बना हो?"
     


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