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Why Not Be Ready?


On Apr 16, 2013 Rekha wrote:

 à¤¹à¤® तैयार क्यों न रहें?

 
-तेनजिन पामो (१ ७  à¤…प्रेल , २ ० १ ३)
 
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी ही हमारा आध्यात्मिक जीवन है। अगर हममें अपने आम जीवन को एक ध्यान की तरह देखने की जागरूकता हो, तभी हमारे इस जीवन का कोई फ़ायदा है, नहीं तो दिन गुज़रते रहते हैं, नश्वरता, जैसा कि हम जानते हैं - एक पल के बाद दूसरा पल, एक दिन के बाद दूसरा दिन, एक साल के बाद दूसरा साल, और फिर अचानक मौत के दरवाज़े तक पहुँच जाते हैं, और तब लगता है हमने इस जीवन का क्या उपयोग किया? हमें यह मालूम नहीं है कि मृत्यु किस पल आ जाये। हर सांस हमारी आखिरी सांस हो सकती है: क्या पता है। जब हम सुबह सो कर उठते हैं, तो हमें यह कहना चाहिए, "कितने आश्चर्य की बात है कि एक और पूरा दिन निकल गया और मैं अभी भी जिंदा हूँ।" कौन जानता है कि कौन सा दिन उसका आखिरी दिन होगा? हमें असल में इस बात की कोई खबर नहीं है। वो सब लोग जो सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं, क्या उन्होंने यह सोचा होगा कि वे मरने के लिए जा रहे थे? मौत इंसान की उम्र, सफलता, सौंदर्य या स्वास्थ्य का ख्याल करके नहीं आती। जब हमारा जाने का समय आ जाता है, तो हम चले जाते हैं।तो हमें प्रत्येक दिन को ऐसे जीना होगा जैसे वो हमारा आखिरी दिन हैै। अगर हम ध्यान से सोचें कि, "कल मैं मरने जा रहा हूँ," तो आप अपने आज को कैसे उपयोग करेंगे? निश्चित रूप से हम अपनी पूरी स्थिति का ठीक से मूल्यांकन करना शुरू कर देंगे।
 
एक बार जब मैं अपनी गुफा में था, एक उग्र बर्फानी तूफान आया और मैं उस बर्फ में कैद हो गया। वो बर्फानी तूफान सात दिन और सात रात लगातार चलता रहा और गुफा पूरी तरह ढ़क गयी । जब मैंने खिड़की खोली, सिर्फ बर्फ की एक चादर नज़र आई; जब मैंने दरवाजा खोला, वहाँ भी सिर्फ बर्फ की चादर थी। मैंने सोचा, "मैं अब बचुंगा नहीं," क्योंकि गुफा बहुत छोटी थी और निश्चित ही उसमें ऑक्सीजन खत्म हो जाएगी और मैं मर जाउंगा । तो मैंने अपने आप को  à¤‡à¤¸ बात के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया[...]और मैं अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगा । मुझसे जो काम ग़लत हुए, उन पर मुझे दुख था, और जो काम ठीक हुए उन पर मुझे खुशी हुई । यह सोचना बहुत हितकारी था क्योंकि मुझे असल में ऐसा लग रहा था कि मैं एक या दो दिन से ज़्यादा नहीं बचुंगा । मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया - जीवन में क्या ज़रूरी है क्या नहीं, क्या सोचने के लायक है क्या नहीं । आम तौर पर हमारा दिमाग़ लगातार बेकार की बातों से भरा रहता है, दिमाग में बराबर चल रहे फिल्मी डायलौग पर दी जा रही हमारी आलोचना । लेकिन जब हमें लगता है कि हमारे पास सोचने का वक़्त बहुत कम है तो हम अपने विचारों पर सोच समझ कर समय लगाते हैं, और इस बात की तरफ़ बहुत ज़्यादा ध्यान देते हैं कि हम अपने समय का कैसे उपयोग कर रहे हैं और अपने मन को किस ओर लगा रहे हैं ।

यदि हम यह सोच कर जीते हैं कि हर दिन हमारा आखिरी दिन है, तो। यह विचार हमें हर पल को मूल्यवान समझने में मदद करता है । यह भाग्यवादी या उदास होना नहीं है । यदि यह हमारा इस धरती पर आखिरी दिन होता, तो हम अपने समय को सावधानी से इस्तेमाल करेंगे । हम और अधिक समस्याऐं नहीं पैदा करेंगे; जो समस्याऐं हमारे पास पहले से हैं, हम उनको हल करने की कोशिश करेंगे । हम और लोगों से अच्छा व्यवहार करेंगे । अगर हम उन्हें फिर कभी नहीं मिल पायेंगे तो क्यों न उनसे अच्छा  à¤µà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° किया जाए? अगर हम यह सोचें कि हम फ़िर इन्हें कभी नहीं मिल पायेंगे, तो क्या हम अपने परिवार, बच्चों, सहयोगियों, और उन सब लोगों को जिन्हें हम छोड़ कर जा रहे हैं, के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेंगे? क्योंकि, कौन जानता है? हम न रहें । एक दिन, हम नहीं रहेंगे । 
 
 
हम तैयार क्यों न रहें?
 
-तेनजिन पामो, "जीवन के हृदय में" के कुछ अंश
 



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