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Waking up to Wisdom
In Stillness and Community

Previous Comments By 'Rekha.rg'

To Be On A Spiritual Path, by Jan Phillips

FaceBook  On Mar 4, 2014 Rekha wrote:

I feel that to be able to see what's special in every experience, one needs to remove oneself as the doer and see the event as an amazing synchrony of cause and effect, as well as the Act of the Spirit which animates and sustains us. Every time I am able to detach myself,  neither feeling proud of myself for good things or cursing myself for the bad,  I feel like an unnecessary burden has been lifted off my system. I feel liberated in the moment. I also feel that to see a clutter free path in the rear view mirror, we can start acting today, because the past is gone and all you can do about it is forget and forgive as well learn the required lessons and apply them to today's actions.A sangha, such as this, is surely a helpful place to deepen any spiritual practice.

 

The Dalai Lama: Why I Laugh, by The Dalai Lama

FaceBook  On Feb 25, 2014 Rekha Garg wrote:

 I think, it necessary to let go of one's ego, in order to laugh authentically. When you can laugh at yourself as others would, there seems no difference who the subject is. The other aspect of laughing authentically comes up when one learns to let go of control in life, or one figures out that you really don't have control on most anything. You might think you are holding the reigns really tight but you fail to see if the reigns are attached to anything on the other end. Once the realization dawns that its someone else holding the reigns and its okay by me, that's when you can laugh about anything from the bottom of your heart.

 

Emotions for Liberation, by Sally Kempton

FaceBook  On Jul 29, 2013 Rekha wrote:

The point of any spiritual practice is to not to teach you to suppress your emotions. That kind of practice would be tedious and temporary. A true practice is one which teaches you the true reality of this material world and which thus helps you let go of attachments. At that point, you are able to express any emotion outwardly but don't get attached to them, so you can move away from them easily. It gives you a capability to witness your emotions objectively and not get carried away by them. This kind of discernment in turn will help your practice get stronger.

 

We Move in Infinite Space, by Rainer Maria Rilke

FaceBook  On Jun 11, 2013 Rekha Garg wrote:

   हम अनंत आकाश में घूम रहे हैं  - रेनिअर à¤®à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ रिल्के द्वारा लिखित  (१० जून, 2013)   मुझे लगता है कि à¤²à¤—भग हमारे सारे दुःख तना  See full.

  

हम अनंत आकाश में घूम रहे हैं 

- रेनिअर à¤®à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ रिल्के द्वारा लिखित  (१० जून, 2013)

 

मुझे लगता है कि à¤²à¤—भग हमारे सारे दुःख तनाव के ऐसे à¤•à¥à¤·à¤£ हैं, जिनमें à¤¹à¤® शक्तिहीनता महसूस करते हैं क्योंकि उस पल में हमें अपनी हैरान भावनाओं के जीवित होने का अहसास होना बंद हो जाता है। क्योंकि हम उस अनजान मौजूदगी के साथ अकेले हैं, à¤œà¤¿à¤¸à¤¨à¥‡ ह्मारे à¤…ंदर प्रवेश कर लिया है; क्योंकि हर उस चीज़, जिस पर हमें विश्वास था, और जिसके हम आदी थे, वो हमसे à¤›à¤¿à¤¨ जाती है, क्योंकि हम à¤à¤• ऐसे बदलाव के बीच खड़े हैं, जहां खडा रह पाना मुश्किल लगता है। इसलिए वह दुःख का पल à¤•à¤Ÿ जाता है। हमारे अंदर जो à¤¨à¤ˆ मौजूदगी जुड़ गयी है, उसने हमारे मन मे प्रवेश कर à¤²à¤¿à¤¯à¤¾ है, à¤‰à¤¸à¤¨à¥‡ हमारे दिल की गहराईयों में घर कर लिया है, और अब वो वहां भी नहीं है, अब तक तो वह à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ रक्त प्रवाह में पहुँच चुकी है।  

 

और हमें पता ही नहीं चलता à¤•à¤¿ à¤¯à¤¹ क्या था। हमें बहुत आसानी से ऐसा विश्वास कराया जा सकता है कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं, और फिर भी à¤¹à¤®à¤®à¥‡à¤‚ बदलाव आ चूका है, जैसेकि एक घर में मेह्मान के प्रवेश करने पर बदलाव आ जाता है। हम कह नहीं सकते कि कौन आ गया है, शायद हमें कभी यह à¤ªà¤¤à¤¾ भी à¤¨à¤¹à¥€à¤‚ चलेगा, लेकिन à¤•à¤ˆ लक्षण ऐसा दर्शाते à¤¹à¥ˆà¤‚ कि à¤­à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ भी बहुत समय पहले से ही à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ अंदर à¤¬à¤¦à¤² जाने à¤•à¥‡ लिए कुछ इसी तरह प्रवेश करता है। और इसी लिए जब हम उदास हों तो एकांत और एकाग्रता हमारे लिए बहुत ही ज़रूरी है: क्योंकि बाहर से साधारण और शांत दिखने वाला à¤µà¥‹ क्षण जब भविष्य à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ अन्दर प्रवेश करता है, हमारे जीवन के लिए उस पल से कहीं ज्यादा ज़रूरी है जब à¤¶à¥‹à¤° लिए à¤”र अचानक वो à¤­à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ हमारा आज बन जाता है जैसे कि वो अभी-अभी बाहर à¤¸à¥‡ पैदा हुआ हो। 

 

हम जितने शांत रहेंगे, हम उदासी à¤•à¥‡ पलों में उतने ही धैर्य और खुले दिमाग से काम लेंगे, उतनी ही गहराई और शान्ति से वह मौजूदगी हममें प्रवेश कर सकेगी, और जितना हम उसे à¤…पना बनाने की कोशिश करते हैं, à¤µà¤¹ उतना ही हमारा भाग्य बन जाती है: और फिर à¤œà¤¬,ऐसा "होता है," (यानि, जब वह निकल कर à¤”र लोगों की तरफ बढ़ती है), हम अपने दिल की गहराईयों से à¤‰à¤¸à¤¸à¥‡ सम्बन्ध और अपनापन महसूस करेंगे। à¤”र वह à¥›à¤°à¥‚री है। यह ज़रूरी à¤¹à¥ˆ - और इस दिशा में à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¤¾ विकास बढेगा, छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए - हमारे साथ कुछ अनजान नहीं होता है, केवल वही होता है जो बहुत समय से हमारा ही था। लोगों को गति के सिद्धांतों à¤•à¥‡ बारे में फिर से विचार करना पड़ा, और वो लोग आखिर यह भी समझ à¤²à¥‡à¤‚गे कि जिसे हम भाग्य कहते हैं, वो बाहर से नहीं आता बल्कि वो हमारे अंदर à¤¸à¥‡ ही उभर कर निकलता है। क्योंकि इतने सारे लोगों ने à¤…पने भाग्य के बीच रहते समय उसे à¤¸à¥‹à¤–ने और à¤¬à¤¦à¤²à¤¨à¥‡ की कोशिश नहीं की है, कि उन्होंने कभी यह अहसास ही नहीं किया कि उनके अंदर से क्या उभर के बाहर आ रहा है; उनके लिए वह à¤‡à¤¤à¤¨à¤¾ अपरिचित था कि अपने भ्रम और भय के बीच उनहोंने सोचा कि जिस पल उन्हें इसका अहसास हुआ, उसी पल वह à¤‰à¤¨à¤•à¥‡ अन्दर प्रवेशित हुआ होगा, क्योंकि वे विश्वास के साथ कहते हैं कि उनहोंने अपने अन्दर ऐसा कुछ कभी देखा ही नहीं। जैसे लोगों को बहुत समय तक सूर्य की गति के बारे में गलत अंदाजा था, वे अभी भी आगे आने वाली चीज़ों की गति के बारे में गलत सोचते हैं। भविष्य स्थिर रहता है, लेकिन हम अनंत आकाश में घूमते हैं।  

 

- रेनिअर à¤®à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ रिल्के, "एक युवा कवि को पत्र"

 

कुछ बीज प्रश्न:  à¤†à¤ª अपने भाग्य को "सोखने à¤”र बदलने" से à¤•à¥à¤¯à¤¾ समझते हैं? "भविष्य स्थिर रहता है और हम अनंत आकाश में घूमते हैं" आप इससे क्या समझते हैं? क्या आप अपना à¤•à¥‹à¤ˆ निजी अनुभव बाँटना चाहेंगे जब आप को लगा हो कि आप अनंत आकाश में घूम रहें हैं? 

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The Endless Fertility of Walking, by Rebecca Solnit

FaceBook  On Apr 30, 2013 Rekha wrote:

 à¤ªà¥ˆà¤¦à¤² चलने के अनंत फायदे  - रेबेका सोनित (१जून, २०१३) देखा जाए तो पैदल चलना  à¤•à¥à¤› ऐसी à¤…वस्था है जिसमें हमारा मन, शरीर और सठ See full.

 à¤ªà¥ˆà¤¦à¤² चलने के अनंत फायदे 
- रेबेका सोनित (१जून, २०१३)
देखा जाए तो पैदल चलना  à¤•à¥à¤› ऐसी à¤…वस्था है जिसमें हमारा मन, शरीर और संसार जैसे एक सीध à¤®à¥‡à¤‚ खड़े हों, à¤œà¥ˆà¤¸à¥‡ कि तीन पात्र à¤†à¥™à¤¿à¤°à¤•à¤¾à¤° एक दूसरे से बातचीत कर पा रहे हों, जैसे à¤¤à¥€à¤¨ स्वर अचानक मिलकर एक सरगम बना रहे हों। पैदल चलना हमें अपने शरीर और दुनिया द्वारा व्यस्त हुए बिना हमें अपने शरीर और दुनिया के साथ चलने में मदद करता है। यह  à¤¹à¤®à¥‡à¤‚ अपने विचारों में खो जाने कि बजाए हमें सोचने की à¤†à¤œà¤¼à¤¾à¤¦à¥€ à¤¦à¥‡à¤¤à¤¾ है। 
मुझे à¤ à¥€à¤• से पता नहीं था कि मैं उस चट्टान के सिरे पर कुछ जल्दी पहुँच गया था या की कुछ देर से, जहाँ जमुनी रंग के à¤²à¥‚पिन के सुंदर फूल खिलते हैं, लेकिन मिल्कमेड के à¤«à¥‚ल सडक के किनारे छाया में, à¤ªà¤—डंडी के रास्ते पर खिले हुए थे, और उन्होंने à¤®à¥à¤à¥‡ अपने बचपन के उन पहाड़ों की याद् दिला दी,जहाँ सबसे पहले ये सफ़ेद फूल खिलते थे। काले रंग की तितलियाँ मेरे चारों ओर मंडरा रहीं थीं, हवा के झोंकों और पंखों की फड़फड़ाहट से इधर उधर उड़तीं, और उन्होंने मुझे अपने उस गुज़रे ज़माने की à¤¯à¤¾à¤¦ दिला दी। पैदल चलने से समय के साथ-साथ चलना à¤•à¥à¤› आसान à¤¹à¥‹ जाता है; हमारा मन पल में à¤¯à¥‹à¤œà¤¨à¤¾à¤“ं से यादों, और यादों से प्रत्यक्ष में भटक à¤²à¥‡à¤¤à¤¾ है। 
पैदल चलने की लय से मन की सोच में भी एक  à¤²à¤¯ à¤ªà¥ˆà¤¦à¤¾ होती है, और किसी प्राकृतिक रास्ते से गुजरने से मन में बहुत से à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤° भी उत्पन्न होते हैं, या गूँज उठते हैं। इससे हमारे आंतरिक à¤”र बाहरी à¤°à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥‹à¤‚ में एक अजीब-सा तालमेल हो जाता है, जिससे à¤¹à¤®à¥‡à¤‚ लगता à¤¹à¥ˆ कि à¤®à¤¨ भी एक तरह का दृष्य है और पैदल चलना à¤‰à¤¸à¥‡ पार करने का एक तरीका है। हर नया विचार उस दृश्य का हिस्सा ही à¤²à¤—ता है जो हमेशा से वहीं था, मानो यह सोच एक à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ ही है , उस विचार की शुरुआत नहीं। इसलिए पदयात्रा के इतिहास का एक पहलू है विचारों के इतिहास को ठोस बनाना - क्योंकि मन की चाल की à¤–ोज कर पाना à¤®à¥à¤¶à¥à¤•à¤¿à¤² है, पर पैरों की चाल की खोज कर पाना आसान है।   
पैदल चलने को एक देखने लायक गतिविधि भी माना जा सकता है, हर पदयात्रा à¤‡à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤¨à¤¾à¤¨ से उन à¤¦à¥ƒà¤¶à¥à¤¯à¥‹à¤‚ को देखने और उन पर विचार करने à¤•à¥‡ लिए है, अज्ञात चीज़ों को ज्ञात चीज़ों से जोड़ने के लिए। शायद à¤ªà¥ˆà¤¦à¤² à¤šà¤²à¤¨à¥‡ की यही à¤…जीब उपयोगिता à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤°à¤•à¥‹à¤‚ के बहुत à¤•à¤¾à¤® आती है। इस यात्रा से पैदा होने वाले à¤†à¤¶à¥à¤šà¤°à¥à¤¯, मुक्ति, à¤”र चीज़ों का साफ-साफ दिखाई पड़ना, इन सबको पाने à¤•à¥‡ लिए हम अपने आस-पड़ोस का à¤šà¤•à¥à¤•à¤° लगा सकते हैं, और या फिर à¤¦à¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का, à¤”र पास और दूर की जगहों की à¤¸à¥ˆà¤° कर सकते हैं।  
या शायद à¤šà¤²à¤¨à¥‡ को गतिविधि ही à¤•à¤¹à¤¨à¤¾ चाहिए, यात्रा नहीं, क्योंकि इंसान एक दायरे में चल सकता है या एक कुर्सी पर बंधे पूरे विश्व का चक्कर लगा सकता है, और यात्रा का मज़ा तो सिर्फ चलते à¤¶à¤°à¥€à¤° की गतिविधियों से ही आता है, न कि कार, नाव या हवाई-जहाज़ के चलने से। वो तो शारीरिक à¤—तिविधि और à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ सामने निकलते दृश्य मिलकर हमारे मन में कोई à¤—तिविधि पैदा करते हैं, यही हमारी यात्रा को अस्पष्ट और बेअंत फायदेमंद बनाता है; यह अपने आप में एक रास्ता भी है और एक अंत भी, यात्रा भी और उद्देश्य भी।  
- रेबेका सोनित
  
Seed questions might be: "How do you relate to the notion of treating thoughts as a landscape that has been there all along? What is the connection between walking and thinking for you? Can you share a personal experience that brings out the connection between walking and thinking? "
कुछ मूल à¤¬à¥€à¤œ सवाल: "आप अपने उन à¤µà¤¿à¤šà¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के बारे में क्या सोचते हैं जिन्हें एक ऐसे à¤¦à¥ƒà¤¶à¥à¤¯ की तरह माना जाए à¤œà¥‹ हमेशा से यहीं था? à¤†à¤ªà¤•à¥‡ लिए पैदल चलने और सोच-विचार करने का आपस में क्या सम्बन्ध à¤¹à¥ˆ? क्या आप अपना कोई  à¤…नुभव सबके सामने रखना चाहेंगे जहाँ पैदल चलने à¤”र सोचने में कोई सम्बब्ध बना हो?"
 

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Why Not Be Ready?, by Tenzin Palmo

FaceBook  On Apr 16, 2013 Rekha wrote:

 If one can at least pose the question - who am  I? - the rest of the life along with the answers you pursue will become clearer. Am I this body, senses, sensory organs, mind, or intellect? Or something more subtle and beyond all the outer layers? The next question to ask would be - why am I here? Even if the answers are not clear right now precisely, there is a general direction. The purpose of every Jeevatma or soul is to understand the reality of that One Supreme Being, there are various sadhnas to get there and our whole life has to become a Sadhna to reach that goal; it is never too soon to embark upon that journey because even though our time on this earth is determined the moment we are born but we don't know how long we have. It is said that human life is granted once after going through millions of life forms and it is only in this form that one can attain God. We cannot vile away this precious human life on mundane thoughts, relationships and actions. Higher we get his lifetime, closer we are to attaining oneness with God and exactly where we get to start next time.

 

Why Not Be Ready?, by Tenzin Palmo

FaceBook  On Apr 16, 2013 Rekha wrote:

 à¤¹à¤® तैयार क्यों न रहें?   -तेनजिन पामो (१ ७  à¤…प्रेल , २ ० १ ३)   हमारी रोजमर्रा की जिंदगी ही हमारा आध्यात्मिक जीवन है। अगर हममे&  See full.

 à¤¹à¤® तैयार क्यों न रहें?

 
-तेनजिन पामो (१ ७  à¤…प्रेल , २ ० १ ३)
 
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी ही हमारा आध्यात्मिक जीवन है। अगर हममें अपने आम जीवन को एक ध्यान की तरह देखने की जागरूकता हो, तभी हमारे इस जीवन का कोई फ़ायदा है, नहीं तो दिन गुज़रते रहते हैं, नश्वरता, जैसा कि हम जानते हैं - एक पल के बाद दूसरा पल, एक दिन के बाद दूसरा दिन, एक साल के बाद दूसरा साल, और फिर अचानक मौत के दरवाज़े तक पहुँच जाते हैं, और तब लगता है हमने इस जीवन का क्या उपयोग किया? हमें यह मालूम नहीं है कि मृत्यु किस पल आ जाये। हर सांस हमारी आखिरी सांस हो सकती है: क्या पता है। जब हम सुबह सो कर उठते हैं, तो हमें यह कहना चाहिए, "कितने आश्चर्य की बात है कि एक और पूरा दिन निकल गया और मैं अभी भी जिंदा हूँ।" कौन जानता है कि कौन सा दिन उसका आखिरी दिन होगा? हमें असल में इस बात की कोई खबर नहीं है। वो सब लोग जो सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं, क्या उन्होंने यह सोचा होगा कि वे मरने के लिए जा रहे थे? मौत इंसान की उम्र, सफलता, सौंदर्य या स्वास्थ्य का ख्याल करके नहीं आती। जब हमारा जाने का समय आ जाता है, तो हम चले जाते हैं।तो हमें प्रत्येक दिन को ऐसे जीना होगा जैसे वो हमारा आखिरी दिन हैै। अगर हम ध्यान से सोचें कि, "कल मैं मरने जा रहा हूँ," तो आप अपने आज को कैसे उपयोग करेंगे? निश्चित रूप से हम अपनी पूरी स्थिति का ठीक से मूल्यांकन करना शुरू कर देंगे।
 
एक बार जब मैं अपनी गुफा में था, एक उग्र बर्फानी तूफान आया और मैं उस बर्फ में कैद हो गया। वो बर्फानी तूफान सात दिन और सात रात लगातार चलता रहा और गुफा पूरी तरह ढ़क गयी । जब मैंने खिड़की खोली, सिर्फ बर्फ की एक चादर नज़र आई; जब मैंने दरवाजा खोला, वहाँ भी सिर्फ बर्फ की चादर थी। मैंने सोचा, "मैं अब बचुंगा नहीं," क्योंकि गुफा बहुत छोटी थी और निश्चित ही उसमें ऑक्सीजन खत्म हो जाएगी और मैं मर जाउंगा । तो मैंने अपने आप को  à¤‡à¤¸ बात के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया[...]और मैं अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगा । मुझसे जो काम ग़लत हुए, उन पर मुझे दुख था, और जो काम ठीक हुए उन पर मुझे खुशी हुई । यह सोचना बहुत हितकारी था क्योंकि मुझे असल में ऐसा लग रहा था कि मैं एक या दो दिन से ज़्यादा नहीं बचुंगा । मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया - जीवन में क्या ज़रूरी है क्या नहीं, क्या सोचने के लायक है क्या नहीं । आम तौर पर हमारा दिमाग़ लगातार बेकार की बातों से भरा रहता है, दिमाग में बराबर चल रहे फिल्मी डायलौग पर दी जा रही हमारी आलोचना । लेकिन जब हमें लगता है कि हमारे पास सोचने का वक़्त बहुत कम है तो हम अपने विचारों पर सोच समझ कर समय लगाते हैं, और इस बात की तरफ़ बहुत ज़्यादा ध्यान देते हैं कि हम अपने समय का कैसे उपयोग कर रहे हैं और अपने मन को किस ओर लगा रहे हैं ।

यदि हम यह सोच कर जीते हैं कि हर दिन हमारा आखिरी दिन है, तो। यह विचार हमें हर पल को मूल्यवान समझने में मदद करता है । यह भाग्यवादी या उदास होना नहीं है । यदि यह हमारा इस धरती पर आखिरी दिन होता, तो हम अपने समय को सावधानी से इस्तेमाल करेंगे । हम और अधिक समस्याऐं नहीं पैदा करेंगे; जो समस्याऐं हमारे पास पहले से हैं, हम उनको हल करने की कोशिश करेंगे । हम और लोगों से अच्छा व्यवहार करेंगे । अगर हम उन्हें फिर कभी नहीं मिल पायेंगे तो क्यों न उनसे अच्छा  à¤µà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° किया जाए? अगर हम यह सोचें कि हम फ़िर इन्हें कभी नहीं मिल पायेंगे, तो क्या हम अपने परिवार, बच्चों, सहयोगियों, और उन सब लोगों को जिन्हें हम छोड़ कर जा रहे हैं, के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेंगे? क्योंकि, कौन जानता है? हम न रहें । एक दिन, हम नहीं रहेंगे । 
 
 
हम तैयार क्यों न रहें?
 
-तेनजिन पामो, "जीवन के हृदय में" के कुछ अंश
 

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The Only Power of the Mystic, by Hazrat Inayat Khan

FaceBook  On Apr 9, 2013 Rekha wrote:

 à¤¯à¥‹à¤—ी à¤•à¥€ à¤à¤•à¤®à¤¾à¤¤à¥à¤° à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ - हजरत इनायत खान (७ अप्रैल, २०१३ )   योगी के पास à¤•à¥‡à¤µà¤² एकमात्र à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ है - प्रेम शक्ति।  उस एक चीज़ में&nb  See full.

 à¤¯à¥‹à¤—ी à¤•à¥€ à¤à¤•à¤®à¤¾à¤¤à¥à¤° à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿

- हजरत इनायत खान (७ अप्रैल, २०१३ )

 

योगी के पास à¤•à¥‡à¤µà¤² एकमात्र à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ है - प्रेम शक्ति। 

उस एक चीज़ में à¤¹à¤° शक्ति à¤›à¥à¤ªà¥€ है जिसे हम प्रेम के नाम से जानते हैं। दान, à¤‰à¤¦à¤¾à¤°à¤¤à¤¾, दया, स्नेह, धैर्य, और à¤¸à¤¹à¤¨à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ - ये सब शब्द एक ही चीज़ के अलग अलग à¤ªà¤¹à¤²à¥‚ हैं; वे केवल एक ही चीज़ à¤•à¥‡ अलग अलग नाम हैं: वो चीज़ है प्रेम। चाहे यह कहा जाए कि 'भगवान प्रेम है", या इसे कोई और à¤¨à¤¾à¤® दिया जाए, सब नाम ईश्वर के ही नाम हैं; और फिर भी à¤ªà¥à¤¯à¤¾à¤° के à¤¹à¤° रूप की, à¤”र à¤ªà¥à¤¯à¤¾à¤° के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले à¤¹à¤° नाम की, à¤…पनी ही खासियत है और अपना कुछ अलग ही कार्य-क्षेत्र भी। दयाभाव में प्रेम एक चीज़ है, सहनशीलता से किया à¤ªà¥à¤°à¥‡à¤® कुछ और है, उदारभाव से किया प्रेम अलग, धैर्यभाव से किया प्रेम कुछ और; लेकिन फिर भी, शुरू à¤¸à¥‡ आखिर तक है प्रेम ही। इसलिए à¤¯à¤¹ याद रहे कि आध्यात्मिक पथ की ऊँचाई तक पहुँचने के लिए, ज्ञान का उतना महत्त्व नहीं है; तंत्र-मन्त्र, योग या सिद्धियों को प्राप्त करने का ज्ञान भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। à¤ªà¤¹à¤²à¤¾ और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है - à¤¹à¥ƒà¤¦à¤¯ की à¤—ुणवत्ता को विकसित करना।  

कोई पूछ à¤¸à¤•à¤¤à¤¾ है: हृदय की गुणवत्ता को कैसे à¤µà¤¿à¤•à¤¸à¤¿à¤¤ à¤•à¤¿à¤¯à¤¾ जा सकता है? उसका à¤¸à¤¿à¤°à¥à¤« एक ही रास्ता है: इस राह à¤ªà¤° बढ़ता हर कदम à¤¨à¤¿:स्वार्थ उठाया जाए, क्योंकि स्वार्थ ही एक ऐसी चीज़ है जो à¤¹à¤®à¥‡à¤‚ à¤…पने हृदय में प्रेम शक्ति को à¤µà¤¿à¤•à¤¸à¤¿à¤¤ à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡ देने में रुकावट डालता है। हम जैसे-जैसे à¤…पने बारे में अधिक à¤¸à¥‹à¤šà¤¤à¥‡ हैं, वैसे-वैसे à¤¦à¥‚सरों के बारे में कम सोचने लगते हैं, और इस राह पर चलते-चलते हम बद à¤¸à¥‡ बदतर होते जाते है। à¤…ंत में हमारा अहम् एक विशालकाय रूप लेकर à¤¹à¤®à¤¾à¤°à¥‡ सामने आता है जिससे हम हमेशा से लड़ते रहे है; और अब इस सफ़र के अंत में यह à¤µà¤¿à¤¶à¤¾à¤² अहम् बहुत बलवान हो जाता à¤¹à¥ˆà¥¤ à¤²à¥‡à¤•à¤¿à¤¨ अगर इस परिपूर्ण à¤°à¤¾à¤¹ पर बढ़ते पहले कदम से ही à¤¹à¤® इस विशाल अहम् से à¤¸à¤‚घर्ष और लड़ाई करना, उस à¤ªà¤° विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो à¤¯à¤¹ केवल प्रेम शक्ति को बढाने से ही मुमकिन हो सकता है। 

 

प्रेम से मेरा à¤•à¥à¤¯à¤¾ तात्पर्य है? यह एक ऐसा शब्द है जिसे एक अर्थ नहीं दिया जा सकता। à¤¦à¤¯à¤¾, नम्रता, अच्छाई, विनम्रता, दयालुता, सुंदरता, जैसे सब गुण उस à¤à¤• ही चीज़ के नाम हैं। à¤‡à¤¸à¤²à¤¿à¤ प्रेम वो à¤§à¤¾à¤°à¤¾ है जो जब उठती है, तो वो एक फव्वारे के रूप में गिरती भी है, और हर à¤¨à¥€à¤šà¥‡ गिरती धारा पुन्य है। किताबों à¤¯à¤¾ किसी à¤§à¤¾à¤°à¥à¤®à¤¿à¤• व्यक्ति द्वारा सिखाये à¤—ुणों में वो à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ या जान नहीं है à¤•à¥à¤¯à¥‹à¤‚कि उन्हें केवल सीखा गया à¤¹à¥ˆ; जिस à¤—ुण को सीखना पड़े उसमें à¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿ नहीं होती, न ही जान। जो गुण à¤¸à¥à¤µà¤¾à¤­à¤¾à¤µà¤¿à¤• रूप à¤¸à¥‡ à¤®à¤¨ की गहराईयों à¤¸à¥‡ फूट कर निकलते हैं, जो गुण एक प्रेम के झरने में से à¤‰à¤ à¤¤à¥‡ हैं, फिर कई अलग पहलुओं की तरह चारों ऒर à¤—िरते हैं, वही गुण असल हैं। एक à¤¹à¤¿à¤‚दुस्तानी  à¤•à¤¹à¤¾à¤µà¤¤ है, 'कि आप के à¤ªà¤¾à¤¸ à¤•à¤¿à¤¤à¤¨à¤¾ धन है, इससे à¤•à¥‹à¤ˆ फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि अगर आपके पास  à¤—ुणों à¤•à¤¾ खजाना à¤¨à¤¹à¥€à¤‚ है, तो वह धन à¤•à¤¿à¤¸à¥€ काम का नहीं है।" सच्चा à¤§à¤¨ वो है जो हरदम बढ़ते हुए प्रेम के झरने की तरह है जिसमें से सब सद्गुण बहते हैं। 

 

- हजरत इनायत खान

"साकी का गिलास" से 

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The Most Subversive Invitation, by John O'Donohue

FaceBook  On Mar 7, 2013 Rekha wrote:
 The Hindu scriptures say that one gets the human birth so we can perform Karma Yoga and find our way to connect our soul with the Supreme. Humans are the only creatures who have been endowed with the body and mind to reach that ultimate goal. Every action we do, every though we think, counts as our Karma and also is being watched by Someone all the time. There is no hiding from Him.. Our soul is divine but it is being directed by our material intellect. We need to make time for contemplation as to the reason for this birth which couldn't have been to eat, drink and be merry! God created this universe as Maya for our bodies to have their basic needs met. Universe was created for our Upyog -necessary use, and not Upbhog-not for exploitation. The unknown lies outside our vision because our senses and mind are material and the Unknown is divine. We have to seek the Unknown's grace by Bhakti and contemplation so He graces us with divine mind and senses so we can perceive and experience Him. In Kalyug the only way to achieve this goal is through Bhakti, and surrender, which to out modern, intellectual mind will sound orthodox. It has been said that in science, you have to take certain facts and experiments for granted or just accept them whether we have seen them and experienced them ourselves or not. And we don't question Science. Existence of God and Spirituality also require just having faith on some basic premise and building upon that faith. We need to to at least give God a chance! Human life is not about its capability to domesticate or control its surroundings, but to let go, surrender to the one who created our universe and marvel at its creation.
 

Fearlessness, by Thich Nhat Hanh

FaceBook  On Feb 12, 2013 Rekha wrote:
 Most things we fear are inventions of our own mind. So you have a choice to act the way you want to. The biggest fear in a human life is to losing a source of happiness. That fear will go away or slowly mitigate if we define what is happiness. Is it the worldly pleasures which are transient in nature or is it your soul's connection with the Ultimate Soul, the God. If we are mindful of the cause or effect of the current source of distress and how is our reaction to it going to affect our goals of meditation, then some of our fears will surely start to melt away. We need to also stop feeling so powerful that any unforeseen event makes you feel powerless. Not everything which is happening around us, is the direct effect or cause of what we or others are doing right now. There are some past Karmas as well, and if we start recognizing and acknowledging the past Karmas as well, then we might be able to break away from the cycle.
 

Fearlessness, by Thich Nhat Hanh

FaceBook  On Feb 12, 2013 Rekha wrote:

 Fearlessness --by Thich Nhat Hanh (Feb 11, 2013) Most of us experience a life full of wonderful moments and difficult moments. But for many of us, even when we are most joyful, there is fear behind our joy. We fear that this moment will end, that we won’t get what we need, that we will lose what we love, or that we will not be safe. Often, our biggest fear is the knowledge that one day our bodies will cease functioning. So even when we are surrounded by all the conditions for happiness, our joy is not complete.   We may think that if we ignore our fears, they’ll go away. But if we bury worries and anxieties in our consciousness, they continue to affect us and bring us more sorrow. We are very afraid of being powerless. But we have the power to look deeply at our fears, and then fear cannot control us. We can transform our fear. Fear keeps us focused on the past or worried about the future. If we can acknowledge our fear, we can realize that right now we are okay. Right now, today, we are still alive, and our bodies are working marvelously. Our eyes can still see the beautiful sky. Our ears can still hear the voices of our loved ones.   The first part of looking at our fear is just inviting it into our awareness without judgment. We just acknowledge gently that it is there. This brings a lot of relief already. Then, once our fear has calmed down, we can embrace it tenderly and look deeply into its roots, its sources. Understanding the origins of our anxieties and fears will help us let go of them. Is our fear coming from something that is happening right now or is it an old fear, a fear from when we were small that we’ve kept inside? When we practice inviting all our fears up, we become aware that we are still alive, that we still have many things to treasure and enjoy. If we are not pushing down and managing our fear, we can enjoy the sunshine, the fog, the air, and the water. If you can look deep into your fear and have  See full.

 Fearlessness
--by Thich Nhat Hanh (Feb 11, 2013)

Most of us experience a life full of wonderful moments and difficult moments. But for many of us, even when we are most joyful, there is fear behind our joy. We fear that this moment will end, that we won’t get what we need, that we will lose what we love, or that we will not be safe. Often, our biggest fear is the knowledge that one day our bodies will cease functioning. So even when we are surrounded by all the conditions for happiness, our joy is not complete.
 
We may think that if we ignore our fears, they’ll go away. But if we bury worries and anxieties in our consciousness, they continue to affect us and bring us more sorrow. We are very afraid of being powerless. But we have the power to look deeply at our fears, and then fear cannot control us. We can transform our fear. Fear keeps us focused on the past or worried about the future. If we can acknowledge our fear, we can realize that right now we are okay. Right now, today, we are still alive, and our bodies are working marvelously. Our eyes can still see the beautiful sky. Our ears can still hear the voices of our loved ones.
 
The first part of looking at our fear is just inviting it into our awareness without judgment. We just acknowledge gently that it is there. This brings a lot of relief already. Then, once our fear has calmed down, we can embrace it tenderly and look deeply into its roots, its sources. Understanding the origins of our anxieties and fears will help us let go of them. Is our fear coming from something that is happening right now or is it an old fear, a fear from when we were small that we’ve kept inside? When we practice inviting all our fears up, we become aware that we are still alive, that we still have many things to treasure and enjoy. If we are not pushing down and managing our fear, we can enjoy the sunshine, the fog, the air, and the water. If you can look deep into your fear and have a clear vision of it, then you really can live a life that is worthwhile. 
 
The Buddha was a human being, and he also knew fear. But because he spent each day practicing mindfulness and looking closely at his fear, when confronted with the unknown, he was able to face it calmly and peacefully. There is a story about a time the Buddha was out walking and Angulimala, a notorious serial killer, came upon him. Angulimala shouted for the Buddha to stop, but the Buddha kept walking slowly and calmly. Angulimala caught up with him and demanded to know why he hadn’t stopped. The Buddha replied, “Angulimala, I stopped a long time ago. It is you who have not stopped.” He went on to explain, “I stopped committing acts that cause suffering to other living beings. All living beings want to live. All fear death. We must nurture a heart of compassion and protect the lives of all beings.” Startled, Angulimala asked to know more. By the end of the conversation, Angulimala vowed never again to commit violent acts and decided to become a monk.
 
How could the Buddha remain so calm and relaxed when faced with a murderer? This is an extreme example, but each of us faces our fears in one way or another every day. A daily practice of mindfulness can be of enormous help. Beginning with our breath, beginning with awareness, we are able to meet whatever comes our way.
 
Fearlessness is not only possible, it is the ultimate joy. When you touch nonfear, you are free. If I am ever in an airplane and the pilot announces that the plane is about to crash, I will practice mindful breathing. If you receive bad news, I hope you will do the same. But don’t wait for the critical moment to arrive before you start practicing to transform your fear and live mindfully. Nobody can give you fearlessness. Even if the Buddha were sitting right here next to you, he couldn’t give it to you. You have to practice it and realize it yourself. If you make a habit of mindfulness practice, when difficulties arise, you will already know what to do.
 
--Thich Nhat Hanh
 
 
 
निर्भयता
- टिक नैट हान (13 फरवरी, 2013)
 
हम में से अधिकतर लोग जीवन में अद्भुत और मुश्किल क्षणों का अनुभव करते हैं। लेकिन हममें से बहुत से लोग जब काफी खुश भी होते हैं तब भी उस ख़ुशी के पीछे एक डर छिपा रहता है। हम डरते हैं कि यह क्षण खत्म हो जाएगा, या हमें वो नहीं मिलेगा जिसकी हमें ज़रुरत है, या हम जिसे प्यार करते हैं, उसे खो देंगे, या हम सुरक्षित नहीं रह पाएँगे। प्रायः हमारे मन में सबसे बड़ा डर यह होता है कि एक दिन हमारा शरीर काम करना बंद कर देगा। तो हमारे चारों तरफ आनन्द का वातावरण फैला होते हुए भी हमारा मन पूरी तरह खुश नहीं होता। 
 
हम शायद यह सोचते हैं कि अगर हम अपने डर को अनदेखा कर दें, तो वो अपने आप मिट जाएगा। लेकिन अगर हम चिंताओं और आशंकाओं को अपने अंतःकरण में दबा देते हैं, तो भी वो हमें प्रभावित करती रहती हैं और हमें और दुःख देती हैं। हम शक्तिहीन होने से बहुत डरते हैं। लेकिन हमारे पास इन आशंकाओं के भीतर झाँकने की शक्ति है, और तब भय हमें नियंत्रित नहीं कर पाएगा। हम अपनी आशंकाओं का रूप बदल सकते हैं। भय हमें अपने अतीत पर या भविष्य की चिंताओं पर केन्द्रित रखता है। अगर हम इस डर को स्वीकार कर लें तो हम जान लेंगे कि इस पल में सब कुछ ठीक है। अभी, आज, हम जिंदा हैं, और हमारे शरीर आश्चर्यजनक रूप से काम कर रहे हैं। हमारी आँखें इस खूबसूरत आकाश को देख सकती हैं। हमारे कान अब भी प्रियजनों की आवाज़ सुन सकते हैं। 
अपने डर की तरफ ध्यान देने के लिए सबसे पहले हमें उसे बिना किसी धारणा के अपनी जागरूकता में लाना होगा। हम सिर्फ हौले से उसके होने को स्वीकार करते लेते हैं। केवल यह भाव ही मन को बहुत राहत दिलाता है। फिर जब हमारा डर कुछ शांत हो जाता है, तब हम उसे प्यार से गले लगा सकते हैं और उसकी जड़, उसके स्रोत को ध्यान से देख सकते हैं। अपनी चिंताओं और डर के मूल कारण को समझ लेने से हमें उनसे मुक्त होने में मदद मिलेगी। क्या हमारा डर किसी ऐसी बात से आ रहा है जो इस वक्त हो रही है या यह कोई पुराना डर है, कोई ऐसा डर जो हमने बचपन से अपने मन में रखा हुआ है? जब हम अपने डर को बाहर निकाल पाने का अभ्यास करते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि हम अब भी जिंदा हैं, और हमारे पास ऐसी बहुत सी बहुमूल्य चीज़ें हैं जिनका हम आनंद ले सकते हैं। अगर हम अपने डर को सिर्फ दबा या उसका कोई उपाय करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, तो हम इस धूप, कोहरे, हवा और पानी का आनंद ले सकते हैं। अगर आप अपने डर की गहराई में झाँक पाएं और उसे स्पष्ट तरीके से देख सकें तो आप एक सार्थक जीवन जी सकते हैं।  
 
बुद्ध एक इंसान थे, और उन्हें भी डर का ज्ञान था। लेकिन क्योंकि उन्होंने हर दिन सचेत साधना और अपने डर को ध्यान से देखने में निकाला, जब उन्हें अज्ञात चीज़ों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने यह बहुत धैर्य और शांति से किया। उनके बारे में एक कहानी है कि वे एक बार कहीं चले जा रहे थे और अंगुलीमाल नामक एक बहुत कुख्यात हत्यारा उनके सामने आ गया। अंगुलीमाल ने चिल्लाकर बुद्ध को रुकने के लिए कहा, लेकिन बुद्ध् शान्ति से हौले-हौले चलते रहे। अंगुलीमाल फिर उनके पास पहुंचा और उसने बुद्ध से पूछा कि वे उसके कहने पर रुके क्यों नहीं। बुद्ध ने जवाब दिया, "अंगुलीमाल, मैं बहुत पहले ही रुक चूका था, वो तो तुम हो जो अब तक नहीं रुके।" उन्होंने उसे समझाया, "मैंने ऐसे सब कर्म करने बंद कर दिए जो दूसरों को तकलीफ पहुंचाएं। हर प्राणी जीना चाहता है। हर प्राणी मरने से डरता है। हमें अपने मन में दूसरों के लिए दया जगानी चाहिए और हर प्राणी की जान की सुरक्षा करनी चाहिए।" हैरान होकर अंगुलीमाल ने उन्हें और बताने के लिए कहा। उस बातचीत के अंत तक अंगुलीमाल ने कसम खा ली कि वह कोई हिंसक काम नहीं करेगा और उसने साधू बन जाने की ठान ली। 
 
एक हत्यारे के सामने बुद्ध इतने शांत और निश्चिन्त कैसे रह पाए? यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन हममें से हर एक इन्सान हर दिन किसी न किसी तौर से अपने डर का सामना करता है। प्रतिदिन सचेत साधना हमें इस काम में बहुत मदद करेगी। अपनी श्वास पर ध्यान देने से शुरू करके, अपनी जागरूकता से शुरू करके, जो भी हमारे रास्ते में आता है, हम उसका सामना कर सकते हैं। 
 
निर्भयता सिर्फ सम्भव ही नहीं बल्कि वह एक परम आनंद है। जब हम अभय को छू लेते हैं, तो हम आज़ाद हो जाते हैं। अगर मैं कभी हवाई जहाज़ में सफर कर रहा हूँ, और पायलट यह घोषणा कर दे कि जहाज़ गिरने वाला है, तो मैं सचेंत प्राणायाम पर ध्यान दूंगा। अगर आप को कोई बुरी खबर मिले, तो मेरी आशा है आप भी ऐसा ही करेंगे। पर अपने डर को परिवर्तित करने और सचेत अवस्था में जीने की साधना को शुरू करने से पहले ऐसे नाज़ुक क्षणों के आने का इंतज़ार मत करो। हमें कोई निर्भयता दे नहीं सकता। अगर बुद्ध भी यहाँ ठीक आपके पास बैठे होते, तो वो भी नहीं दे सकते थे। इसका अभ्यास आपको खुद करना होगा और खुद ही इसका अहसास करना होगा। अगर आप सचेत साधना को अपनी आदत बना लें, तो जब परेशानियां आएंगी, तो आपको पहले से ही पता होगा कि उनका सामना कैसे करना है। 


 --टिक नैट हान

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Beyond the Conflict of Inner Forces, by Cherokee Story

FaceBook  On Feb 5, 2013 Rekha Garg wrote:

    Beyond the Conflict of Inner Forces --by Cherokee Story (Feb.6, 2013)   An old Cherokee is teaching his grandson about life: “A fight is going on inside me,” he said to the boy.”It is a terrible fight and it is between two wolves. One is evil – he is anger, envy, sorrow, regret, greed, arrogance, self-pity, guilt, resentment, inferiority, lies, false pride, superiority, and ego.” He continued, “The other is good – he is joy, peace, love, hope, serenity, humility, kindness, benevolence, empathy, generosity, truth, compassion, and faith. The same fight is going on inside you – and inside every other person, too.” The grandson thought about it for a minute and then asked his grandfather: “Which wolf will win?” You might heard the story ends like this: The old Cherokee simply replied, “The one you feed.” In the Cherokee world, however, the story ends this way: The old Cherokee simply replied, “If you feed them right, they both win.” and the story goes on:  “You see, if I only choose to feed the white wolf, the black one will be hiding around every corner waiting for me to become distracted or weak and jump to get the attention he craves. He will always be angry and always fighting the white wolf. But if I acknowledge him, he is happy and the white wolf is happy and we all win. For the black wolf has many qualities – tenacity, courage, fearlessness, strong-willed and great strategic thinking – that I have need of at times and that the white wolf lacks. But the white wolf has compassion, caring, strength and the ability to recognize what is in the best interest of all. "You see, son, the white wolf needs the black wolf at his side. To feed only one would starve the other and they will become uncontrollable. To feed and care for both means they will serve you well and do nothing that is not a part of someth  See full.

 

 

Beyond the Conflict of Inner Forces
--by Cherokee Story (Feb.6, 2013)
 
An old Cherokee is teaching his grandson about life:
“A fight is going on inside me,” he said to the boy.”It is a terrible fight and it is between two wolves. One is evil – he is anger, envy, sorrow, regret, greed, arrogance, self-pity, guilt, resentment, inferiority, lies, false pride, superiority, and ego.” He continued, “The other is good – he is joy, peace, love, hope, serenity, humility, kindness, benevolence, empathy, generosity, truth, compassion, and faith. The same fight is going on inside you – and inside every other person, too.”
The grandson thought about it for a minute and then asked his grandfather: “Which wolf will win?”
You might heard the story ends like this: The old Cherokee simply replied, “The one you feed.”
In the Cherokee world, however, the story ends this way:
The old Cherokee simply replied, “If you feed them right, they both win.” and the story goes on: 
“You see, if I only choose to feed the white wolf, the black one will be hiding around every corner waiting for me to become distracted or weak and jump to get the attention he craves. He will always be angry and always fighting the white wolf. But if I acknowledge him, he is happy and the white wolf is happy and we all win. For the black wolf has many qualities – tenacity, courage, fearlessness, strong-willed and great strategic thinking – that I have need of at times and that the white wolf lacks. But the white wolf has compassion, caring, strength and the ability to recognize what is in the best interest of all.
"You see, son, the white wolf needs the black wolf at his side. To feed only one would starve the other and they will become uncontrollable. To feed and care for both means they will serve you well and do nothing that is not a part of something greater, something good, something of life. Feed them both and there will be no more internal struggle for your attention. And when there is no battle inside, you can listen to the voices of deeper knowing that will guide you in choosing what is right in every circumstance. Peace, my son, is the Cherokee mission in life. A man or a woman who has peace inside has everything. A man or a woman who is pulled apart by the war inside him or her has nothing.
"How you choose to interact with the opposing forces within you will determine your life. Starve one or the other or guide them both.”
–Cherokee Story
 
 आंतरिक बलों के संघर्ष से परे 
--चेरोकी कथा (6 फरवरी, 2013)
एक बूढ़ा चेरोकी अपने पोते को इस जीवन का पाठ पढ़ा रहा है:
"मेरे अंदर एक संघर्ष चल रहा है।" उसने बच्चे से कहा। "यह एक भयानक संघर्ष है और यह दो भेड़ियों के बीच हो रहा है। एक दुष्ट है - वह क्रोध, ईर्ष्या, दुख, पछतावा, लालच, अहंकार, आत्म-दया, अपराध, आक्रोश, हीनता, झूठ, झूठी शान, श्रेष्ठता, और अहंकार है।" उसने आगे कहा, "दूसरा भला है - वह सुख, शांति, प्रेम, आशा, शांति, विनम्रता, दया, परोपकार, सहानुभूति, उदारता, सच्चाई, करुणा, और विश्वास है। वही लड़ाई तुम्हारे अंदर चल रही है -और सब लोगों के अंदर भी।" 
बच्चे ने इस बारे में कुछ पल सोचा और फिर अपने दादा से पूछा: "कौन सा भेड़िया जीतेगा?"
आपने इस कहानी का अंत कुछ इस प्रकार सुना होगा: बूढ़े चेरोकी ने सीधा-सा जवाब दिया, "जिस भेड़िये को तुम खाना डालोगे।"
लेकिन चेरोकी जगत में यह कथा कुछ इस प्रकार ख़त्म होती है:
बूढ़े चेरोकी ने सीधा-सा जवाब दिया, "अगर तुम उनको ठीक प्रकार से खिलाओ, तो वो दोनों ही जीत जाते हैं।" और कहानी आगे चलती है: 
"देखो, अगर मैं सिर्फ सफ़ेद भेड़िये को ही खाना खिलाऊं, तो काला भेड़िया हर कोने में छिप कर मेरा ध्यान बटने या मेरे कमज़ोर होने का इंतजार करेगा और मौका पाते ही मेरा ध्यान खींचने के लिए मुझ पर कूद पड़ेगा। वह हमेशा नाराज़ रहेगा और हमेशा सफ़ेद भेड़िये के साथ लड़ता रहेगा। लेकिन अगर मैं उसे स्वीकार कर लूँ तो वह खुश हो जाता है, और सफ़ेद भेड़िया भी खुश है और हम सब जीत जाते हैं। क्योंकि उस काले भेड़िये में भी बहुत गुण हैं - दृढ़ता, साहस, निर्भयता, मजबूत इरादे, बड़ी रणनीतिक सोच - जिनकी मुझे कभी-कभी ज़रुरत पड़ सकती है और जिनका सफ़ेद भेड़िये में अभाव है। लेकिन सफ़ेद भेड़िये में दया, सेवा, शक्ति, और यह पहचानने की क्षमता है कि सब के सर्वोत्तम हित में क्या है। 
"तो देखो बच्चे, सफ़ेद भेड़िये को काले भेड़िये का साथ ज़रूरी है। सिर्फ एक को खिलाने से दूसरा भूखा रह जाएगा और वो दोनों बेकाबू हो जाएँगे। दोनों को खिलाने और दोनों का ख्याल रखने का मतलब है कि वो दोनों  ही तुम्हारी अच्छी तरह सेवा करेंगे और ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो कि किसी बेहतर चीज़, किसी अच्छे काम या अच्छे जीवन का हिस्सा न हों। उन दोनों को खिलाओ और उन दोनों के बीच तुम्हारा ध्यान खींचने के लिए कोई आंतरिक संघर्ष नहीं रह जाएगा। और जब अंदर कोई संघर्ष नहीं है, तो तुम अपने मन की गहराई में छुपी आवाज़ों को सुन सकते हो जो कि हर परिस्थिति में सही क्या है यह चुनने में तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगी। शांति, मेरे बच्चे, चेरोकी जीवन का लक्ष्य है। जिस आदमी या औरत के अंदर शांति है, उसके पास सब कुछ है। जो आदमी या औरत अपने अंदर हो रहे युद्ध के कारण दोनों तरफ खिंच रहा है, उसके पास कुछ भी नहीं है। 
"तुम अपने अंदर के विरोधी तत्वों से कैसा व्यवहार रखोगे, उसी पर तुम्हारा जीवन निर्भर करता है। एक को भूखा रखो या दूसरे को, या दोनों का मार्गदर्शन करो। "
--चेरोकी कथा 

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Gift from the Sea, by Anne Morrow Lindberg

FaceBook  On Jan 8, 2013 Rekha Garg wrote:
 I think the idea here is in conformity with the law of karma - its the ocean of karma from which we get gifts of all kinds and we have no choice now. In the current state we just have no way of knowing our past accumulated karma and what is coming our way next. We just have to have faith in the system. All we can do is wait and see while staying on our path. Staying calm and still will make accepting what comes forth, easy! Also this state will probably lead us into the intricacies of our eternal memory and bring peace. Fighting or digging for treasures may not bring what our heart desires right now. It is more important to enjoy and focus on the journey than waste our time waiting for the destination.
We do not choose most anything in life. Its just that when things turn our the way we wanted, we have more faith in God and when they don't, that's not the God you want to believe in. What you believe currently or not does not change the fact that there is a universal power who runs this world. When you look at nature and the rules with which it operates, you have to have faith in an entity who is responsible for all this. The real Me has to reconnect with that God  and that's all there is to it.
 

The Power of Myth, by Joseph Campbell

FaceBook  On Dec 11, 2012 Rekha wrote:
Mythology is powerful literature, and sometimes seems to provide very contradictory messages and difficult to understand and appreciate by using just the intellect. I feel the power of these stories have to be learnt from at an inner level, level of the pure heart from a Guru - a God realized soul, who can help us navigate the path of these stories and provide their relevance to our current lives. Once understood to a certain extent, they can provide a solid anchor for our lives and help us figure out the meaningfulness of any actions and effects of previous actions, taking place now. For example, the concept of Karma, originating from Hindu mythology, gives me a perspective about loosening my control  over effects of my efforts in my day to day life. Things don't always turn out in direct proportion to my effort. But I have to consciously keep moving in a positive direction in order to create new Karma and also to mitigate any effects of past Karma. At the same time understanding, that positive effects were not all my current effort as well  as the negative effects we also not all my lack of attention.
 

The Challenge of Gift-Giving, by Nitin Paranjape

FaceBook  On Nov 28, 2012 Rekha Garg wrote:
 I believe being able to receive graciously is also an art and a big practice. People in general and mostly people who are givers from the heart ( me included) have very hard time receiving gifts without feeling undeserving or embarrassed and even less powerful. It is important for both the giver and the receiver to go thorough the process in a way where there is a comfort level on both ends to an extent that both feel at peace, happy, deserving of the moment and attention given and received and acceptance. This applies not only to material gift-giving whether store-bought or hand-made, but also to other acts of kindness someone does for you. Personally, in this context, I love doing things for others, cooking being one of my ways to show love for others. And there are days when I'm physically too exhausted to carry on even the basic cooking, but when my husband asks me to sit down so he can cook and feed me, I find it very hard to receive his gift. Mostly, the reason being it makes me feel less in control and the weaker link. I think the kind of happiness you would like to feel in your heart as a giver , you have to allow others the same by receiving beautifully and without feeling awkward. Without a receiver, there is no giver!
 

Frying the Seeds of Anger, by Swami Vivekananda

FaceBook  On Nov 13, 2012 Rekha Garg wrote:
 I think anger is an emotion where one feels that my own emotions, feelings and needs are more that anyone else's, where one's ego is at its prime. You only get angry at situations and people who are not functioning according to my own made up values or ideas. But the bottom line is: I'm not supreme and so my ideas are not the only way to think and act in the world. When one begins to understand that everyone is at a different stage of evolutionary process and acting accordingly and if you conceivably happen to be at a better place than others in being able to say and do the right thing at the right time,then the best you can do is show compassion for the ones who have not quite reached your level. Such a thought process will help nip the anger in the bud because we have transformed our energy from anger to compassion and done both of us a favor.
 

The Way of the Farmer, by Masanobu Fukuoka

FaceBook  On Oct 9, 2012 Rekha Garg wrote:
 Thoughtlessly ruining nature in the name of progress and scientific development is an extremely narrow and near-sighted approach. We need to take only as much as we need and not as much as we desire. Especially dissecting each part of our food into scientific labels is the end of the nourishment, nutritious value and wholesomeness of our food. After all what we are ingesting is not a potion of vitamins and minerals, but its a combination of so many elements of human and natural endeavor from farm to table and then with what gratitude we are accepting this amazing offering called food is what is going to provide us proper nourishment. Closer we are to nature, the more appreciation we would have of the amount of labor involved in the production of food what a crime it is to waste food. Anyone who has done any edible gardening can truly appreciate that fact.